गुरु – शिष्य परंपरा

हमारे ऋषी-मुनीओ , संतो और महापुरुषो के जीवन मै गुरु का महत्त्व बहुत है l 

सदगुरु का महीमा हर धर्म मे है l 

गुरु और शिष्य की नामावली देखनेसे पता चलता है

की महापुरुषों की महानता के पीछे गुरु की कीतनी जरूरत है l 

वंश दो है , एक बिंदुवंश और दूसरा नादवंश l 

पिता-पुत्र के वंश को बिदुवंश  कहते है 

और गुरु-शिष्य की परम्परा को नादवंश कहते है l 

शिष्य अपनेसे  सवायो आगे निकले वो सदगुरु चाहते है 

और इसीलिए कहागया है ” पुत्रात् शिष्यत् पराजयन्त् “

 

अब गुरु – शिष्य परंपरा की जोड़ी को जानिए l 

 

– श्री क्रष्ण भगवान के गुरु : सांदीपनी ऋषी 

– श्री राम, लक्ष्मण के गुरु : विश्वामित्र ऋषी

– भगवान परशुराम के गुरु : श्री कश्यप ऋषी

– अर्जुन के गुरु : श्री कृष्ण 

– संत ज्ञानेश्वर के गुरु : मुकताबाई 

– संत एकनाथ के गुरु : श्री जनार्दन स्वामी 

– सूरदास और दामोदरदास के गुरु : श्री वल्लभाचार्यजी 

– संत कबीर के गुरु : स्वामी रामानन्द 

– स्वामी विवेकानंद के गुरु : श्री राम्क्रष्ण परमहंस 

– संत मोरारी बापू के गुरु : श्री त्रिभोवनदास दादा और तुलसीदासजी 

 

कहने का तात्पर्य यह है की शिष्य के उत्कर्ष मै सदगुरु रूपी  गुरु का योगदान महत्वका है l 

 

डॉ . सुधीर शाह 

 

Posted on 21/05/2013, in Dr.Sudhir Shah. Bookmark the permalink. 1 ટીકા.

  1. Without the presence of Sadguru, final liberation cannot be attained by the bhakt. The Guru’s guidance can help the disciple cross over lifetimes in the least of time. It is his grace alone that establishes the direct connection with God.

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